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Showing posts from April, 2021

'न जाने क्यों...'

*न जाने क्यों...* न जाने क्यों यह लग रहा है...  जिंदगी हाथों से निकल रही है! मुट्ठी में बंद रेत की तरह हौले-हौले फिसल रही है! न जाने क्यों मन उदास है... कुछ छूटने का आभास है। वक्त छल रहा छलिए की तरह उर से टूटती हर आस है! न जाने क्यों ख़्वाबों पर पहरे हैं... बेरंग बने मेरे सपने सुनहरे हैं। लौ उम्मीद की बुझती दीये की तरह सहला न पाऊँ कि जख़्म गहरे हैं! न जाने क्यों तम मुझे डराए... रौशनी का कतरा नज़र न आए। सहम जाऊँ भयव्याप्त असहाय की तरह, कैसे मन अंजान संशय से निकल पाए? श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' नागपुर, महाराष्ट्र  27/04/21

'हँसगुल्ला (1)'

*हँसना जरूरी है...।😀* अब आप मानो या ना मानों... पर हम महिलाओं की थमी हुई उम्र का ही कमाल है कि सरकार को 'कोविड वैक्सीन' के लिए तय उम्र 45 को घटाकर 18 करनी पड़ी।  वरना दुनिया की आधी आबादी तो रह जाती... बिना सुई... ऊई माँ... ऊई...! श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' 22/04/21

प्रभु प्रार्थना... 🙏🌹🙏

'प्रभु प्रार्थना...' 🙏🌹🙏 कोरोना ने आकर दुनिया में  यूँ  हाहाकार मचाया है, पाषण हृदय वाला मानव भी देखो आज घबराया है! "मास्क जरूरी, दो गज की दूरी" चारों ओर है यहीं नारा, सकल ज्ञान संसार का देखो अतिसूक्ष्म विषाणु से हारा! रोगग्रस्त अपनों को लें परिजन भटक रहें दवाखानों में, जमापूँजी देने को तत्पर नहीं रिक्त पलंग अस्पतालों में! पुस्तकों में पढ़ी कथाओं-सी... महामारी भीषण आई है, अंतिम यात्रा की दुखद विदाई न रुदन न शोक-रुलाई है! हर रिश्तेदार विवश बैठा और पड़ोसी सभी गुमसुम से है, आँखों में नमी संग भय है व्याप्त...हाय! कैसे दुर्दिन ये है! क्षति शरीर की और प्राणों की दिन प्रतिदिन हो रही यहाँ, पर नेताओं के चुनावी रैली... भाषणबाजी में कमी कहाँ! कैसी विडंबना आई प्रभु! अब तुम्हीं तारो हे 'मधु' मुरारी, रोग, समय का चक्र सहित... हर विपदा तुमसे प्रभु हारी! हर विपदा तुमसे प्रभु हारी... ।।2।। श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' 18/04/21

परीक्षा : तनाव से फैसले तक

' परीक्षा : तनाव से फैसले तक' कोराना से जनता हारी देखो विपदा बहुत बड़ी, त्राहिमाम जनता पुकारे... कैसे सब इससे उबरें? ऊपर से परीक्षा का तनाव बिना स्कूल ही बीता साल रे, परीक्षार्थी असमंजस में..... कैसे होगा अब बेड़ा पार रे! सरकार चेती... बैठक, चर्चा संग हुआ समीक्षा हर पहलू, सीबीएससी दसवीं हो रद्द... आगे बढ़े परीक्षा बारहवीं। है उद्देश एकमात्र यही... भारत का भविष्य सुरक्षित हो, परीक्षाएँ तो प्रतिवर्ष होगी पर घात कहीं न किंचित हो। नमन है देश के मुखिया को.....  नतमस्तक 'मधु' होती है, है लोक-सुरक्षा सर्वोपरि हम उस माटी पर जन्मीं बेटियाँ हैं। श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' नागपुर, महाराष्ट्र  14/04/21

वक्त...

खुशामद करो या इबादत कर लो, वक्त अपनी फितरत बदलेगा नहीं। ये हर सबक तुम्हें सिखाएगा बशर्त, जब तलक अपनी गलती मानोगे नहीं। कसौटियों पर कसेगा कभी ढील भी देगा, तुम्हें तराशेगा जौहरी 'मधु' कीमत बढ़ाएगा। ये तय तुम्हें ही करना है बनना या बिखरना है, समझ इसके इशारे तू बढ़... ये रुलाएगा नहीं। श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' 12/04/21

मधु प्रेरणा (2)

"किसी भी वस्तु या व्यक्ति की उपेक्षा या निंदा करने से पहले हमें एक बार अपने मनोगत पर सूक्ष्मता से विचार अवश्य करना चाहिए।" याद रखिए... "यूँ तो कालिख किसी को नहीं पसंद, हर कोई कालिख से बचता रहता है किन्तु छोटे बालकों को बुरी नज़र से बचाने के लिए बड़े प्रेम और आत्मीयता से स्वयं काजल की डिबिया से काजल निकाल बच्चों के नेत्रों व माथे पर लगाकर सुख का अनुभव करता है।" श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' 11/04/21

वक्त बदलेगा...🌹

वक्त छल रहा है पर गुजर ही जाएगा, दूर होंगे गम... हर शख़्स मुस्कुराएगा। लौटकर खुशियाँ किवाड़ खटखटाएँगी, फिर सड़कों पर... रौनक लौट आएगी! कागजों पर उतरते दर्द इतिहास बनेंगे, लबों पर सजा शब्द 'मधु' गुनगुनाएगी। श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' 10/04/21

मधु कलम से... छात्र-संदेश

प्यारे बच्चो! मैं जानती हूँ कि महाराष्ट्र सरकार द्वारा परीक्षा नहीं लेने (पहली से आठवीं/ स्टेट बोर्ड) का व सभी बच्चों को उत्तीर्ण करने का निर्णय वर्तमान परिस्थिति के अनुसार उचित हो सकता है किन्तु यह भी गलत नहीं है कि कोरोना ने न केवल हमारे जीवन शैली को प्रभावित किया है बल्कि शिक्षा व्यवस्था पर भी करारा प्रहार किया है!  ऑनलाइन शिक्षण-प्रशिक्षण ने शिक्षार्थियों के साथ-साथ अपने-अपने विषयों के शिक्षाविद शिक्षक/शिक्षिकाओं को भी पूर्णतः परिवर्तन की ओर ले आया। हाँ, मैं एक हिंदी विषय अध्यापिका हूँ और तकनीकी ज्ञान का औसतन व आवश्यकतानुसार अनुभव रखती थी। इस ऑनलाइन पढ़ाई के लिए मैंने और मेरी ही तरह कितने शिक्षकों ने अथक प्रयास किए और कर रहें हैं। ऐसे में जब छात्र परीक्षा के प्रति उदासीनता दिखाते हैं या बिना परीक्षा उत्तीर्ण होने की बात सुन, पढ़ाई से विमुख होने लगते हैं तो हमें दुख होता है। प्यारे बच्चो, परीक्षा केवल आपके प्राप्तांक को नहीं दर्शाता अपितु यह आपकी अज्ञानता, विषयों की अनभिज्ञता व किस दिशा में आपको अधिक परिश्रम करना है यह संकेत देता है। आपको केवल अंकों के लिए पढ़ाई नहीं करनी है बल्...

मधु प्रेरणा (1)

"सफलता की चाह रखते हो तो  असफलता को भी स्वीकार करो। गर चढ़ना है 'मधु' ऊँचाईयों तक, फिसलन पर भी मुस्कान रखो।" श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' 08/04/21

'विश्व स्वास्थ्य दिवस'

 नमस्कार मित्रो! आज के दिन-विशेष अर्थात 'विश्व स्वास्थ्य दिवस' के बारे में आप सभी जानते होंगे। साथ ही इससे संबंधित अन्य जानकारियाँ आप सहज ही पा सकते हैं। आज यहाँ इस पोस्ट में मैं इस संकटमय कालाधारित अपने व्यक्तिगत अनुभवों संबंधित कुछ विषयों की ओर आपका ध्यान चाहूँगी।  मित्रों, वर्तमान समय किसी आपातकालीन समय से कमतर नहीं है। पूरा एक वर्ष हमने कोरोना के भय के साये में गुजारा हैं। पिछले वर्ष मार्च 2020 के समय हर शख़्स बस यही कहता रहा कि "जल्दी से यह दो हजार बीस गुजर जाए और दो हजार इक्कीस कुछ राहत लेकर आए" किन्तु काल के गर्भ में क्या छिपा है कौन जानता था...! प्रकृति से खिलवाड़, प्रकृति विरोधी आचरण, भक्षण हमें कहाँ ले आया...! खुद को सर्वशक्तिमान (ज्ञान-विज्ञान में) समझने की भूल करता मनुष्य अनायास ही ईश्वरीय शक्ति का शरणार्थी बनता गया। किन्तु यह विडंबना ही है कि जब पिछले वर्ष इस संक्रामक बीमारी ने हमें देश में फैलते अपने प्रकोप की भीषण झाँकी मात्र दिखाई थी तब भी जाने-अंजाने हमने इसकी जटिलताओं को गंभीरता से नहीं लिया। परिणाम आज एक विक्राल रूप में हमारे सामने है...! दोस्तो! सकार...

महिला दिवस

 *'नारी : कल और आज'* ब्रह्मा ने बनाया सबला जिसे, दुनिया ने पुकारा अबला कह। दुर्गा, शक्ति का रूप थी जो, हर ज़ुल्म को सहती रह गई वह! वाणी उसकी कल-कल करती नहर, मुस्कान है ज्यों मोहक निर्झर। फिर भी नयनों में बसे गागर। दो आँखों में तप्त भरा सागर! फिर ज्योतिबा जैसे मिले पति, बन गुरु जिन्होंने शिक्षा दी। देश को प्रथम महिला शिक्षिका मिली, एक नई राह फिर नारी चली। रानी, इंदिरा, कल्पना बनी, खेल संग हर क्षेत्र में उड़ान भरी। समानता, अधिकार की माँग उठी, तब 'महिला दिवस' की नींव पड़ी। अष्टभुजाधारी रूप धर वह, बेटी-बहन, माँ-पत्नी, बहु बनी। पहले जगना, अंत में सोना, सीखा हर हाल में खुश रहना। दुनिया जागी, मनुष्यता चेती, सम्मान की हकदार बनी बेटी। एक दिन क्यों, हर दिन है इनके, खुशहाली वहाँ, जहाँ कदम इनके। बस बात एक आज भी खटकती है, कुछ संकीर्ण मानसिकता दुख देती है। 'ना' कहने का 'मधु' अधिकार इसे, फिर क्यों तेजाब, गोलियाँ पाती हैं? *'स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित रचना'* द्वारा :- श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' नागपुर, महाराष्ट्र। 28/02/21  [महिला दिवस (08/03/21) के लि...

पप्पा

 'पप्पा' (श्रद्धांजलि) 🙏🌹🙏 हाड-माँस के देह में जैसे वे दिव्य कोई अवतार थे, 'पप्पा' केवल मनुज नहीं  दिलों में बसता प्यार थे। क्या याद रखूँ क्या बिसराऊँ कितने उनके उपकार हैं, बिन उनके घर खाली-खाली पर दिल में एक संसार है। माँ कहती मेरे होने पर उनकी खुशी का न ठिकाना था, रात्रि एक बजे भी उन्होंने  कितने होटलों को छाना था! पंडित ने कहा कि... नाम इसका नहीं सुन्दर कोई रखना, घबराएँ यूँ कि 'पागल' की संज्ञा दें थे चाहे मुझको जपना। बस दो ही जोड़ी वस्त्रों में सदा परम संतुष्टि पाते, पाई-पाई जोड़कर थे...  वे पुस्तक-कलम जुटाते! पैदल-पैदल काम पर जाते... पैदल ही लौटकर आते, बेटियों का पथ सुगम करते खुद साइकिल न ले पाते!  बना पसीना रक्त बहाते किंतु रत्ती भर नहीं सकुचाते, शिक्षार्थी बेटियों को देखकर  थे वे परमानंद को पाते। बासठ की आयु में ही उन्हें लिया काल ने लील, तीन वर्षों से बिन उनके हम पाँचों यहाँ गमगीन। विधि पर बस है नहीं किसी का...  कैसे हम लाते छिन, हर जन्म वे ही हो जनक हमारे यही विनती है प्रतिदिन। (आदरणीय 'पप्पा' के तृतीय पुण्यतिथि पर 'मधु' कलम की शब्दांजलि...