'न जाने क्यों...'
*न जाने क्यों...* न जाने क्यों यह लग रहा है... जिंदगी हाथों से निकल रही है! मुट्ठी में बंद रेत की तरह हौले-हौले फिसल रही है! न जाने क्यों मन उदास है... कुछ छूटने का आभास है। वक्त छल रहा छलिए की तरह उर से टूटती हर आस है! न जाने क्यों ख़्वाबों पर पहरे हैं... बेरंग बने मेरे सपने सुनहरे हैं। लौ उम्मीद की बुझती दीये की तरह सहला न पाऊँ कि जख़्म गहरे हैं! न जाने क्यों तम मुझे डराए... रौशनी का कतरा नज़र न आए। सहम जाऊँ भयव्याप्त असहाय की तरह, कैसे मन अंजान संशय से निकल पाए? श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' नागपुर, महाराष्ट्र 27/04/21