बचपन वाला बचपना लौटकर कभी न आए, खट्टी-मीठी याद लिए सीने में कहीं छिप जाए। माँ की लोरी घर की बातें 'मधु' स्मृतियों से झाँके, बहु बनने के बाद कौन... मन बेटी वाला पाए ? श्रीमती माधुरी मिश्रा 19/09/20
तू अंत है आगाज़ है, तू मौन है आवाज़ है । ममतामयी आँचल है तू, तू गीत है तू साज़ है।। मदमस्त सी निर्झर है तू, गहरे सागर की लहर है तू। भास्कर सी ओजस्वी है, कभी चाँद सी शीतल है तू।। तू अंतर्मन की अनकही है, सब मिथ्या बस तू सही है। 'मधु' हृदय बसती है तू, 'हिंदी' तेरे बिन हिंद कुछ नहीं है।। श्रीमती माधुरी मिश्रा 14/09/20 #हिंदी_दिवस_की_शुभकामनाएँ
इंसानियत इंसान की पहचान है, वरना तो यारों कीड़े में भी जान है। सड़ती-गलती आत्मा जो ढो रहा, जीवित होकर भी वह मृतक समान है। श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' 06/09/20
'कोशिश' देखा है 'मधु' कोशिशें अक्सर रंग लाती हैं, नन्हीं-सी इक बूँद सागर में बदल जाती है।। एक साल से बंद पड़ा था जो यह ब्लाॅग मेरा, पहली सफल रचना इस बात को सच बताती है।। श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' 03/08/20