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'अंतर्द्वंद्व'

'अंतर्द्वंद्व' आज फिर दोनों तरफ़ बरसात हो रही हैं... एक आसमान से और एक मेरे भीतर कहीं किसी कोने में...! बरसती बूँदों की टिप्-टिप् ध्वनि मानों मेरे अंतर्मन की अनकही व्यथा के शोर को मुझ तक पहुँचने से रोकना चाहती हैं किन्तु ये नहीं जानती 'कुछ बरसात और कुछ दर्द बिना आवाज़ ही कानों को चुभते रहते हैं...! कोई अन्य ध्वनि इनकी चीखती ख़ामोशियों को न रोक पाती हैं और न ही उद्वेलित हृदय में धैर्य का संचार कर सकती हैं...!' हाँ, आज फिर आसमानी बादल के साथ कुछ टूट रहा है... मेरा मन और हृदय में संजोए कुछ अधूरे ख़्वाब...! ऐ काश! अंतर्मन के इस बिखराव की भी कोई आवाज़ होती...! काश! कि टूटते ख़्वाबों का भी उपचार संभव होता और अवसाद के स्थान पर फिर एक उन्मुक्त हँसी खोज लेती अपना ठिकाना हृदय के रिक्त पड़े उस एक कोने में...! हाँ, काश कि बचपन की वह निश्चल, स्वतंत्र मुस्कुराहट घर कर लेती अधीर अधरों पर पुनः एक बार... और मुस्कुरा उठती 'मधु' आँखें फिर नए सपनों को सजाकर...! सर्वाधिकार सुरक्षित... द्वारा :- श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' 20/09/21

'ज़िंदगी'

'ज़िंदगी' जन्म से लेकर मृत्यु के बीच है ज़िंदगी, कभी मजबूरी तो कभी तीज है ज़िंदगी। रेगिस्तानी रेत में पानी-सा छलावा है ज़िंदगी, कभी दर्द बेइंतिहा तो कभी मुस्कान है ज़िंदगी। सपनों से मन बहलाती आशाएँ जगाती ज़िंदगी, कभी शीशमहल की तरहा बिखर जाती ज़िंदगी। आँखों में आँसू सजा लबों को हँसाती है ज़िंदगी, कभी सुलझी लच्छी कभी गाँठ बन जाती ज़िंदगी। इक जीवन को कितने रंगों से सजाती है ज़िंदगी, कभी सौतन कभी सहेली 'मधु' बन जाती ज़िंदगी। श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' नागपुर, महाराष्ट्र