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'कितना आसान है...!'

कितना आसान है... दूसरों पर पीछे हँस देना, कितना मुश्किल है हँसी की इक वजह बनना! जो बस मस्ती के आलम में दिन-रात रहते हैं, कितना मुश्किल है उन्हें हकीकत से मिलाना! कितना आसान है झूठे किस्सों को गढ़़ लेना, कितना मुश्किल है सच को बयान कर पाना! भूल जाते  है गहरे जख़्म देनेवाले अक्सर, कितना मुश्किल है जख़्मों का मलहम बनना! कितना आसान है  क्रमशः 

'नहीं रहीं... माँ हीरा बेन!'

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30th December 2022, Friday. #heera_ben  #rip_maan_heera_ben  #मोदी_माँ_निधन   मोदी जी- "शानदार शताब्दी का ईश्वर चरणों में विराम।"  "असाधारण पुत्र को जन्म देनेवाली; साधारण जीवन जीनेवाली; बेटों को सदैव सत्य, धर्म, कर्म की शिक्षा देनेवाली प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी 'माँ हीरा बेन' का निधन...!" इसी साल उनका 100वाँ जन्मदिन मनाया गया। मोदी जी भी उसमें शामिल हुए थे। 18 जून 1923 को जन्मीं माँ हीरा बेन ने आज दिनांक 30/12/22, शुक्रवार को  प्रातः 3:30 बजे अंतिम साँस ली। उनका अंतिम संस्कार आज ही गांधीनगर, गुजरात में संपन्न होगा। अभी सुबह 8:25, मोदी जी अपने माँ को कंधा देते हुए... (टी.वी.पर लाइव) मोदी जी के साथ सभी देशवासियों के लिए दुख की घड़ी। माँ हीरा बेन की अविस्मरणीय सीख- "काम करो बुद्धि से, जीवन जियो शुद्धि से।" दोस्तों, "माँ दूर जा सकती है पर... दूर नहीं हो सकती।" श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' नागपुर, महाराष्ट्र  

संगीत सम्राज्ञी : लता मंगेशकर 'दीदी'

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'दीदी' नहीं रहीं...!!! "दिनांक 06/02/2022, सभी भारतवासियों के लिए दुखद समाचार...! संगीत की एक अमूल्य निधि सदा-सर्वदा के लिए खो गई। ऐसा लग रहा है मानो, सभी स्वर खामोश हो गए हैं।"   'लता मंगेशकर' सिर्फ़ नाम नहीं... यह तो संगीत का एक युग है। ऐसा युग जो स्वर्णिम अक्षरों में इतिहास के पन्नों पर अंकित हो गया है। उनके जीवन का हर दिन ऐतिहासिक है। फिर चाहे बात उनके स्वभाव की हो, जीवन के संघर्ष की या सफलता के उच्चतम शिखर की...! सभी कुछ श्रोता-उर में चिरस्थायी हो चुके हैं। 'लता मंगेशकर', एक ऐसी महिला जिसने बचपन से (बारह वर्ष की उम्र में पहली रिकॉर्डिंग की) लेकर 92वें की उम्र तक लगातार एक नया इतिहास रचा है; जिसने संसार को नित विनम्रता, सहनशीलता, और हार न मानने की शिक्षा दी; जिसने संगीत-सम्राज्ञी बनकर भी शालीनता को कंठ के साथ-साथ आँखों में बसाएँ रखा...!  'दीदी'! निसंदेह, साक्षात माँ सरस्वती की बेटी थी। आज 8 बजकर 12 मिनट में उन्होंने इस लोक से विदा ली और संभवतः अब उनकी दिव्यात्मा माँ शारदे के लोक प्रस्थान कर चुकी है...! आखिर माँ भी तो इतने वर्ष अप...

'गणतंत्र दिवस'

दिनांक      :- 26/01/22 दिन-विशेष :- गणतंत्र दिवस  विधा  :- कविता विषय :- 'गणतंत्र दिवस'  हँसते-हँसाते खुशियाँ लुटाते 'गणतंत्र दिवस' है आया, कोरोना की हर लहर को भूल मेरा हिंददेश मुस्काया। तिहत्तरवीं वर्षगाँठ अबकी चहुँ ओर आनंद है छाया, सावधानी बरत सुरक्षित हुई जनता का हृदय हर्षाया। माना कि बीमारी बहुत बड़ी फिर भी मानस न भूला, गम की बदली से झाँक रहा उम्मीद का नया सवेरा। प्रजातंत्र है देश में अपने मताधिकार वयस्कों ने पाया, अधिकार, सुरक्षा, जिम्मेदारी संग हिंदुस्तान की बदली काया। जाति-धर्म और भेद-भाव सज्जनों ने सबकुछ बिसराया, संविधान के अनुच्छेदों संग समानाधिकार सभी ने पाया। हँसते-हँसाते खुशियाँ लुटाते गणतंत्र दिवस है आया, कोरोना की हर लहर को भूल मेरा हिंददेश मुस्काया। द्वारा :- श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' नागपुर, महाराष्ट्र 

'अंतर्द्वंद्व'

'अंतर्द्वंद्व' आज फिर दोनों तरफ़ बरसात हो रही हैं... एक आसमान से और एक मेरे भीतर कहीं किसी कोने में...! बरसती बूँदों की टिप्-टिप् ध्वनि मानों मेरे अंतर्मन की अनकही व्यथा के शोर को मुझ तक पहुँचने से रोकना चाहती हैं किन्तु ये नहीं जानती 'कुछ बरसात और कुछ दर्द बिना आवाज़ ही कानों को चुभते रहते हैं...! कोई अन्य ध्वनि इनकी चीखती ख़ामोशियों को न रोक पाती हैं और न ही उद्वेलित हृदय में धैर्य का संचार कर सकती हैं...!' हाँ, आज फिर आसमानी बादल के साथ कुछ टूट रहा है... मेरा मन और हृदय में संजोए कुछ अधूरे ख़्वाब...! ऐ काश! अंतर्मन के इस बिखराव की भी कोई आवाज़ होती...! काश! कि टूटते ख़्वाबों का भी उपचार संभव होता और अवसाद के स्थान पर फिर एक उन्मुक्त हँसी खोज लेती अपना ठिकाना हृदय के रिक्त पड़े उस एक कोने में...! हाँ, काश कि बचपन की वह निश्चल, स्वतंत्र मुस्कुराहट घर कर लेती अधीर अधरों पर पुनः एक बार... और मुस्कुरा उठती 'मधु' आँखें फिर नए सपनों को सजाकर...! सर्वाधिकार सुरक्षित... द्वारा :- श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' 20/09/21

'ज़िंदगी'

'ज़िंदगी' जन्म से लेकर मृत्यु के बीच है ज़िंदगी, कभी मजबूरी तो कभी तीज है ज़िंदगी। रेगिस्तानी रेत में पानी-सा छलावा है ज़िंदगी, कभी दर्द बेइंतिहा तो कभी मुस्कान है ज़िंदगी। सपनों से मन बहलाती आशाएँ जगाती ज़िंदगी, कभी शीशमहल की तरहा बिखर जाती ज़िंदगी। आँखों में आँसू सजा लबों को हँसाती है ज़िंदगी, कभी सुलझी लच्छी कभी गाँठ बन जाती ज़िंदगी। इक जीवन को कितने रंगों से सजाती है ज़िंदगी, कभी सौतन कभी सहेली 'मधु' बन जाती ज़िंदगी। श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' नागपुर, महाराष्ट्र 

'पापा'

'पापा' रुढ़िवाद के खिलाफ... वे उदारता की मिसाल थे, बेटी के सपनों के रक्षक हमारे पापा बेमिसाल थे। "दुनिया जो कहती कहने दो तुम नित नई उड़ान भरो", अंधकार भरी राह में भी हमारे पापा जलती मशाल थे। भाग्य भरोसे नहीं रहते किस्मत को देते हुँकार थे, हर घर में हो पिता उन-सा बेटी मन की पुकार थे। निज दुख को भूल मुस्काते जब सम्मुख बेटी के आते थे, हर इच्छा सच में बदलते रहें  हमारे पापा ईश-उपहार थे। दो जोड़ी में वक्त काटते  हमारे लिए हर सुविधा जुटाते, पैदल ही हर दूरी नापते हमारे पापा हमारा अभिमान थे। दूर किया निष्ठुर विधि ने... सर्वस्व लुटाकर वे मौन हुए, अंतिम स्पर्श था चरणों का पापा स्मृति-पटल आसीन थे। ***** श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' 20/06/21