'पापा'
'पापा' रुढ़िवाद के खिलाफ... वे उदारता की मिसाल थे, बेटी के सपनों के रक्षक हमारे पापा बेमिसाल थे। "दुनिया जो कहती कहने दो तुम नित नई उड़ान भरो", अंधकार भरी राह में भी हमारे पापा जलती मशाल थे। भाग्य भरोसे नहीं रहते किस्मत को देते हुँकार थे, हर घर में हो पिता उन-सा बेटी मन की पुकार थे। निज दुख को भूल मुस्काते जब सम्मुख बेटी के आते थे, हर इच्छा सच में बदलते रहें हमारे पापा ईश-उपहार थे। दो जोड़ी में वक्त काटते हमारे लिए हर सुविधा जुटाते, पैदल ही हर दूरी नापते हमारे पापा हमारा अभिमान थे। दूर किया निष्ठुर विधि ने... सर्वस्व लुटाकर वे मौन हुए, अंतिम स्पर्श था चरणों का पापा स्मृति-पटल आसीन थे। ***** श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' 20/06/21