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'पापा'

'पापा' रुढ़िवाद के खिलाफ... वे उदारता की मिसाल थे, बेटी के सपनों के रक्षक हमारे पापा बेमिसाल थे। "दुनिया जो कहती कहने दो तुम नित नई उड़ान भरो", अंधकार भरी राह में भी हमारे पापा जलती मशाल थे। भाग्य भरोसे नहीं रहते किस्मत को देते हुँकार थे, हर घर में हो पिता उन-सा बेटी मन की पुकार थे। निज दुख को भूल मुस्काते जब सम्मुख बेटी के आते थे, हर इच्छा सच में बदलते रहें  हमारे पापा ईश-उपहार थे। दो जोड़ी में वक्त काटते  हमारे लिए हर सुविधा जुटाते, पैदल ही हर दूरी नापते हमारे पापा हमारा अभिमान थे। दूर किया निष्ठुर विधि ने... सर्वस्व लुटाकर वे मौन हुए, अंतिम स्पर्श था चरणों का पापा स्मृति-पटल आसीन थे। ***** श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' 20/06/21

कहानी (1) :- 'घरौंदा'

*कथा लेखन :- (1)* *घरौंदा* नगर के नामी शाला की प्राथमिक शिक्षिका सरला जिनसे भी मिलती, उनके मन में अपना स्थान बना लेती। सरल, सुंदर युवती 'सरला' यूँ तो अंतर्मुखी लड़की थी किन्तु माता-पिता के साथ भाभी द्वारा किए जा रहें व्यवहार से आहत हो कभी-कभार अपने स्वभाव के विपरीत बहुत कुछ बोल जाती। सरला के मंगेतर रमेश को अक्सर यह शिकायत रहती कि वह जब भी फोन करता वह माता-पिता के लिए चिंतित रहती।  "मम्मी जी, महंगाई बहुत बढ़ गई है। शक्कर और पत्ती के दाम तो आसमान छू रहें हैं, तो आज से आपकी और पिताजी की शाम की चाय बंद... अब आपको केवल सुबह ही चाय मिलेंगी..." भाभी के इन शब्दों ने तो सरला के सब्र के बाँध को तोड़ ही दिया। "भाभी, जबान संभालकर बोलिए। जब आप टू व्हीलर की जगह कार लेकर बाहर जाती है, पार्टी करती है, तब महंगाई की याद नहीं आती?"  "सरला, तुम अपना काम करो। कुछ दिनों की मेहमान हो तो हमारे घर के मामले में अपनी नाक मत घुसाओ। बेटी हो, बेटी को तरह रहो, नहीं तो इन दोनों को अपने ससुराल ले जाना, या कहीं और व्यवस्था करा देना। अब हमसे इनके खर्चे नहीं उठाए जाते।"  भाभी की इन ब...