'मेरी माँ... मम्मा'
किताबें ज्यादा पढ़ी नहीं पर आँखें मेरी पढ़ लेती है, चादर की लंबाई को बिसरा सुंदर सपने गढ़ लेती है। मेहनत जितनी चाहे कर लूँ... वह चूम थकान मिटा देती है, कोई चाहे बुरा तो फिक्र नहीं उसकी दुआ बला हर लेती है। सफेदी लिए केश में भी... वह सभी से सुंदर नारी है, छोटी-बड़ी झुर्रियों के आगे हर कोमल काया हारी है। नादान है छोटी बच्ची-सी... मीठी डाँट भी मुझसे सुनती है, अगले ही पल नादानी कर बहानों का ताना-बाना बुनती है। प्रौढ़ावस्था में आकर भी बस... ममता की मूरत लगती है, देखूँ जब छवि भगवती की मुझे 'माँ' की सूरत दिखती है। श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु ' 16/03/21