पप्पा

 'पप्पा' (श्रद्धांजलि) 🙏🌹🙏


हाड-माँस के देह में जैसे वे दिव्य कोई अवतार थे,

'पप्पा' केवल मनुज नहीं  दिलों में बसता प्यार थे।


क्या याद रखूँ क्या बिसराऊँ कितने उनके उपकार हैं,

बिन उनके घर खाली-खाली पर दिल में एक संसार है।


माँ कहती मेरे होने पर उनकी खुशी का न ठिकाना था,

रात्रि एक बजे भी उन्होंने  कितने होटलों को छाना था!


पंडित ने कहा कि... नाम इसका नहीं सुन्दर कोई रखना,

घबराएँ यूँ कि 'पागल' की संज्ञा दें थे चाहे मुझको जपना।


बस दो ही जोड़ी वस्त्रों में सदा परम संतुष्टि पाते,

पाई-पाई जोड़कर थे...  वे पुस्तक-कलम जुटाते!


पैदल-पैदल काम पर जाते... पैदल ही लौटकर आते,

बेटियों का पथ सुगम करते खुद साइकिल न ले पाते! 


बना पसीना रक्त बहाते किंतु रत्ती भर नहीं सकुचाते,

शिक्षार्थी बेटियों को देखकर  थे वे परमानंद को पाते।


बासठ की आयु में ही उन्हें लिया काल ने लील,

तीन वर्षों से बिन उनके हम पाँचों यहाँ गमगीन।


विधि पर बस है नहीं किसी का...  कैसे हम लाते छिन,

हर जन्म वे ही हो जनक हमारे यही विनती है प्रतिदिन।


(आदरणीय 'पप्पा' के तृतीय पुण्यतिथि पर 'मधु' कलम की शब्दांजलि ; दिनांक :- 04/04/21) 


श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु'

नागपुर, महाराष्ट्र।

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