महिला दिवस
*'नारी : कल और आज'*
ब्रह्मा ने बनाया सबला जिसे,
दुनिया ने पुकारा अबला कह।
दुर्गा, शक्ति का रूप थी जो,
हर ज़ुल्म को सहती रह गई वह!
वाणी उसकी कल-कल करती नहर,
मुस्कान है ज्यों मोहक निर्झर।
फिर भी नयनों में बसे गागर।
दो आँखों में तप्त भरा सागर!
फिर ज्योतिबा जैसे मिले पति,
बन गुरु जिन्होंने शिक्षा दी।
देश को प्रथम महिला शिक्षिका मिली,
एक नई राह फिर नारी चली।
रानी, इंदिरा, कल्पना बनी,
खेल संग हर क्षेत्र में उड़ान भरी।
समानता, अधिकार की माँग उठी,
तब 'महिला दिवस' की नींव पड़ी।
अष्टभुजाधारी रूप धर वह,
बेटी-बहन, माँ-पत्नी, बहु बनी।
पहले जगना, अंत में सोना,
सीखा हर हाल में खुश रहना।
दुनिया जागी, मनुष्यता चेती,
सम्मान की हकदार बनी बेटी।
एक दिन क्यों, हर दिन है इनके,
खुशहाली वहाँ, जहाँ कदम इनके।
बस बात एक आज भी खटकती है,
कुछ संकीर्ण मानसिकता दुख देती है।
'ना' कहने का 'मधु' अधिकार इसे,
फिर क्यों तेजाब, गोलियाँ पाती हैं?
*'स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित रचना'*
द्वारा :-
श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु'
नागपुर,
महाराष्ट्र।
28/02/21 [महिला दिवस (08/03/21) के लिए लिखी रचना]
अत्यंत संवेदनशील एवं भावपूर्ण रचना 💕👌👌👌👌
ReplyDeleteबहुत-बहुत धन्यवाद प्रिय दीप्ति जी...🙏🙏🌹
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