'विश्व स्वास्थ्य दिवस'

 नमस्कार मित्रो!


आज के दिन-विशेष अर्थात 'विश्व स्वास्थ्य दिवस' के बारे में आप सभी जानते होंगे। साथ ही इससे संबंधित अन्य जानकारियाँ आप सहज ही पा सकते हैं। आज यहाँ इस पोस्ट में मैं इस संकटमय कालाधारित अपने व्यक्तिगत अनुभवों संबंधित कुछ विषयों की ओर आपका ध्यान चाहूँगी। 


मित्रों, वर्तमान समय किसी आपातकालीन समय से कमतर नहीं है। पूरा एक वर्ष हमने कोरोना के भय के साये में गुजारा हैं। पिछले वर्ष मार्च 2020 के समय हर शख़्स बस यही कहता रहा कि "जल्दी से यह दो हजार बीस गुजर जाए और दो हजार इक्कीस कुछ राहत लेकर आए" किन्तु काल के गर्भ में क्या छिपा है कौन जानता था...! प्रकृति से खिलवाड़, प्रकृति विरोधी आचरण, भक्षण हमें कहाँ ले आया...! खुद को सर्वशक्तिमान (ज्ञान-विज्ञान में) समझने की भूल करता मनुष्य अनायास ही ईश्वरीय शक्ति का शरणार्थी बनता गया। किन्तु यह विडंबना ही है कि जब पिछले वर्ष इस संक्रामक बीमारी ने हमें देश में फैलते अपने प्रकोप की भीषण झाँकी मात्र दिखाई थी तब भी जाने-अंजाने हमने इसकी जटिलताओं को गंभीरता से नहीं लिया। परिणाम आज एक विक्राल रूप में हमारे सामने है...!


दोस्तो! सकारात्मक सोच बहुत अच्छी बात है किन्तु "हमारे जीवन में सबकुछ बिल्कुल ठीक ही होगा" यह सोच क्या सर्वथा उचित ही है...? मैंने अपने आसपास कुछ ऐसे वाक्य सुने हैं जिसने जाने-अंजाने कोरोना को सर्वत्र फैलाने में अवश्य ही योगदान दिया है। ऐसी मानसिकता वाले व्यक्ति एक ओर अपने स्वास्थ्य के प्रति उदासीनता तो दिखाते ही हैं दूसरी ओर लापरवाही/भूल स्वरूप दूसरों के प्राणों को भी संकट में डाल देते हैं। 

ऐसी ही कुछ अवधारणाएँ... 


1) यह तो उनके बुरे कर्मों का परिणाम है... हमें कुछ नहीं होगा।


2) ईश्वर ने सभी के जाने का माध्यम बना रखा है, अगर जाना होगा तो खड़े-खड़े चले जाएँगे।


3) हम नहीं मानते ऐसी किसी बीमारी को... टी.वी. वाले ऐसे ही बढ़ा-चढ़ाकर समाचार दिखाते है।


4) हम तो बस अपने रिश्तेदारों के यहाँ ही जाते हैं... उन्हें थोड़ी कोई बीमारी है।


5) बड़ो के पैर छूने, अपनों के गले लगने में कोई बुराई नहीं है। आदि...!


साथियों...

कोरोना एक भयंकर संक्रामक बीमारी है। यह हमारा स्वभाव या कर्म देखकर नहीं आएगी। न ही यह अटल सत्य है कि हमारे अपने, हमारा परिवार, परिचितों व मित्रों को यह कभी हो ही नहीं सकता...! फिर यह लापरवाही क्यों? क्यों हम अपने ही स्वास्थ्य के लिए शत्रु बनते रहें? हाँ यह भी परम सत्य है कि संसार में सबकुछ ईश्वरीय इच्छा से ही होता है किन्तु सिर्फ यही सोचकर हम सावधानियों से जी नहीं चुरा सकते न...! आप स्वयं सोचिए यदि आपके लिए लाई गई चाय की प्याली में काॅकरोच गिरा मिलें तो क्या तब भी आप उसे ईश्वर की इच्छा मानकर पी लोगे या स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर उसे नहीं पीओगे...? नहीं पीओगे न! उसी तरह सभी परिस्थितियों को जानबूझ कर लापरवाही बरतें और सबकुछ ईश्वरीय इच्छा के नाम से ढक दें, क्या यह उचित है?


दोस्तो! वर्तमान समय न केवल मुश्किल है बल्कि यह हमारे संयमित, अनुशासित जीवन का परीक्षा काल भी है। हमें न केवल अपनी सतर्कता और सावधानियों से इस परीक्षा में उत्तीर्ण होना है बल्कि संक्रमण रूपी असफलता को मात भी देना है। इसके लिए हमें निम्नलिखित बातों को अवश्य ध्यान में रखना होगा :-


1) कोरोना एक संक्रामक बीमारी है और यह किसी को भी हो सकता है।


2) हमें हमेशा मास्क  पहनना चाहिए। (जो यह कहते है उन्हें इससे घुटन होती है, वे जरूर ध्यान रखें कि यह अस्पताल के ऑक्सीजन मास्क से बेहतर है।)


3) कुछ समय (स्थितियाँ सामान्य होने तक) अपने रिश्तेदारों से मित्रों से दूर ही रहें। (रिश्तों में जीवन जरूरी है, समीपता नहीं।)


4) अपने आस-पास स्वच्छता रखें, समय-समय पर अपने हाथ साबुन या सेनेटाइज़र से साफ करें। (ईश्वर आपका तभी साथ देंगे, जब आप स्वयं का साथ देंगे।)


5) आवश्यकता पडने पर ही घर से निकले वह भी पूरी सावधानी के साथ।


6) शाॅपिंग, पार्टियों आदि से बचें। (भविष्य सुरक्षित रहा तो यह सब पुनः होगा।)


7) सामूहिक प्रसंगों में जाने या ऐसे आयोजनों से बचें।


8) कोरोना वैक्सीन जरूर लें। (इससे संबंधित अफवाहों पर न ध्यान दें, न ऐसी अफवाहों को फैलाए।)


9) राज्यस्तरीय सरकारी निर्देशों का सकारात्मक विचारों संग पालन करें।


दोस्तो! 

यह ज़िंदगी बहुत कीमती है। इसे केवल अफवाहों, लापरवाही या आलस्य की बली न चढाओ। आज थोड़ी सावधानी बरतो और कल अपनों के साथ दिल से मुस्कुराओ। 


"अपने स्वास्थ्य का रखो खयाल, 

गुजर जाएगा यह कोरोना काल।"


द्वारा :- 

श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु'

शिक्षिका, नागपुर, 

महाराष्ट्र।

(07/04/21)

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