*कथा लेखन :- (1)* *घरौंदा* नगर के नामी शाला की प्राथमिक शिक्षिका सरला जिनसे भी मिलती, उनके मन में अपना स्थान बना लेती। सरल, सुंदर युवती 'सरला' यूँ तो अंतर्मुखी लड़की थी किन्तु माता-पिता के साथ भाभी द्वारा किए जा रहें व्यवहार से आहत हो कभी-कभार अपने स्वभाव के विपरीत बहुत कुछ बोल जाती। सरला के मंगेतर रमेश को अक्सर यह शिकायत रहती कि वह जब भी फोन करता वह माता-पिता के लिए चिंतित रहती। "मम्मी जी, महंगाई बहुत बढ़ गई है। शक्कर और पत्ती के दाम तो आसमान छू रहें हैं, तो आज से आपकी और पिताजी की शाम की चाय बंद... अब आपको केवल सुबह ही चाय मिलेंगी..." भाभी के इन शब्दों ने तो सरला के सब्र के बाँध को तोड़ ही दिया। "भाभी, जबान संभालकर बोलिए। जब आप टू व्हीलर की जगह कार लेकर बाहर जाती है, पार्टी करती है, तब महंगाई की याद नहीं आती?" "सरला, तुम अपना काम करो। कुछ दिनों की मेहमान हो तो हमारे घर के मामले में अपनी नाक मत घुसाओ। बेटी हो, बेटी को तरह रहो, नहीं तो इन दोनों को अपने ससुराल ले जाना, या कहीं और व्यवस्था करा देना। अब हमसे इनके खर्चे नहीं उठाए जाते।" भाभी की इन ब...
वक्त छल रहा है पर गुजर ही जाएगा, दूर होंगे गम... हर शख़्स मुस्कुराएगा। लौटकर खुशियाँ किवाड़ खटखटाएँगी, फिर सड़कों पर... रौनक लौट आएगी! कागजों पर उतरते दर्द इतिहास बनेंगे, लबों पर सजा शब्द 'मधु' गुनगुनाएगी। श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' 10/04/21
'कोशिश' देखा है 'मधु' कोशिशें अक्सर रंग लाती हैं, नन्हीं-सी इक बूँद सागर में बदल जाती है।। एक साल से बंद पड़ा था जो यह ब्लाॅग मेरा, पहली सफल रचना इस बात को सच बताती है।। श्रीमती माधुरी मिश्रा 'मधु' 03/08/20
Well said Dii..👍👍🤞🤞
ReplyDeleteधन्यवाद प्रिय बहन।😍
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